जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची पहली बार भारत दौरे पर पहुंच चुकी हैं. दुनिया के हर कोने में मची उथल-पुथल के बीच 2 जुलाई को पीएम मोदी के साथ उनकी अहम बैठक होनी है. एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि ये सिर्फ दो नेताओं की मुलाकात नहीं है, बल्कि एशिया का भविष्य तय करने वाला महामंथन है. दोनों देश मिलकर एक ऐसी चक्रव्यूह की तैयारी कर रहे हैं, जिसके बाद ये साफ हो जाएगा कि एशिया एक किसी एक देश की जागीर नहीं है. रक्षा समझौतों से लेकर करेंसी की नई डील तक, इस समिट में कुछ ऐसा होने जा रहा है जो आने वाले दशकों तक वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगा.
जब दो ‘नेचुरल एलाइज’ ने मिलाया हाथ
जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट डॉ ब्रह्मा चेलानी के मुताबिक, जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची का ये दिल्ली दौरा इंडो-पैसिफिक के लिए एक गेम-चेंजर साबित होने वाला है. दुनिया में इस समय समीकरण बहुत तेजी से बदल रहे हैं. यूक्रेन-रूस, ईरान-अमेरिका संकट से लेकर ताइवान तक तनाव चरम पर है. ऐसे माहौल में भारत और जापान की ‘स्पेशल स्ट्रेटेजिक एंड ग्लोबल पार्टनरशिप’ यानी एशिया में शांति और स्थिरता का सबसे मजबूत खंभा बनकर उभरी है.
भारत और जापान को ‘नेचुरल सहयोगी’ माना जाता है. दोनों के बीच न तो कोई सीमा विवाद है और न ही कोई ऐतिहासिक कड़वाहट. इसके उलट, दोनों का एक ही लक्ष्य है- एशिया को किसी एक देश की जागीर बनने से रोकना. चीन जिस तरह से दक्षिण चीन सागर से लेकर भारतीय सीमाओं तक अपनी विस्तारवादी नीति चला रहा है, उसे रोकने के लिए इन दोनों महाशक्तियों का एक साथ आना बेहद जरूरी हो गया था.
इस शिखर सम्मेलन का सबसे बड़ा एजेंडा आर्थिक मोर्चे पर है. दोनों देश ‘येन-रुपया सेटलमेंट मैकेनिज्म’ को अंतिम रूप देने की तैयारी में हैं. आसान भाषा में कहें तो अब भारत और जापान आपस में व्यापार करने के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भर नहीं रहेंगे. भारत जापानी येन में और जापान भारतीय रुपए में सीधे कारोबार कर सकेंगे.






