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बीबी की किस्मत का फैसला आज, 73 लाख वोटर्स तय करेंगे इजरायल का भविष्य, भारत के लिए क्यों अहम हैं ये चुनाव?

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इजरायल में आज होने वाला चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है. देश की सुरक्षा, गाजा और ईरान के साथ युद्ध, अमेरिका से रिश्ते और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजरायल की छवि जैसे मुद्दे इस चुनाव के केंद्र में हैं. नेतन्याहू एक बार फिर सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट और पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट समेत दूसरे विरोधियों से कड़ी चुनौती मिल रही है.
इस चुनाव पर भारत की भी नजर है. इजरायल में सरकार बदलने या मौजूदा गठबंधन के दोबारा सत्ता में आने का असर भारत-इजरायल संबंधों की दिशा पर पड़ सकता है. भारत-इजरायल के बीच के रिश्ते पिछले एक दशक में काफी मजबूत हुए हैं और इस बीच वहां की सत्ता बेंजामिन नेतन्याहू ही संभाल रहे थे. हालांकि रक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में दोनों देशों के मजबूत संबंध बने रहने की उम्मीद है.
ट्रंप से दोस्ती और ईरान युद्ध पर नेतन्याहू का प्रचार
नेतन्याहू अपने चुनाव प्रचार में सुरक्षा और युद्ध के दौरान अपने नेतृत्व को प्रमुखता दे रहे हैं. वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपने करीबी संबंधों को भी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश कर रहे हैं. उनका तर्क है कि ट्रंप के साथ साझेदारी इजरायल को ईरान जैसे क्षेत्रीय विरोधियों से निपटने में मदद कर सकती है.
नेतन्याहू ने दावा किया कि अगर वह दोबारा सत्ता में आते हैं, तो ट्रंप ईरान से पैदा होने वाले खतरे को खत्म करने के लिए फिर कार्रवाई करने को तैयार हैं. इस बयान के जरिए वह मतदाताओं को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके नेतृत्व में इजरायल को अमेरिका का मजबूत समर्थन मिलता रहेगा.
हालांकि नेतन्याहू के विरोधी उनके इस प्रचार पर सवाल उठा रहे हैं. पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट ने प्रधानमंत्री पर डर, झूठ और धमकियों के सहारे चुनाव लड़ने का आरोप लगाया है. उनका कहना है कि अमेरिका इजरायल के लोगों द्वारा चुने गए किसी भी नेता के साथ मिलकर काम कर सकता है.
गाजा युद्ध और सरकार की नीतियां भी मुद्दा
इस चुनाव में 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमलों और उसके बाद गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई को लेकर भी मतदाताओं के बीच गहरे मतभेद हैं. नेतन्याहू की सरकार को युद्ध के संचालन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा है. वहीं अगली सरकार बनाने के लिए नेतन्याहू को दक्षिणपंथी सहयोगियों इतामार बेन-ग्विर और बेजालेल स्मोट्रिच के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है. फिलिस्तीनियों के प्रति उनकी नीतियों को लेकर इन नेताओं की पश्चिमी देशों में आलोचना हुई है. ऐसे में सरकार गठन के दौरान गठबंधन की राजनीति निर्णायक साबित हो सकती है. इजरायल की संसद नेसेट की 120 सीटों के लिए हो रहे चुनाव से पहले कई सर्वेक्षणों में किसी एक दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना नहीं जताई गई थी.

भारत पर क्या पड़ेगा चुनाव का असर?
भारत के लिए इजरायल का चुनाव केवल वहां की घरेलू राजनीति का मामला नहीं है. दोनों देशों के बीच रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन, साइबर सुरक्षा और आधुनिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग लंबे समय से अहम रहा है. इसलिए नई सरकार की नीतियां भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों को प्रभावित कर सकती हैं.
रक्षा सहयोग: भारत इजरायल से सैन्य उपकरण, मिसाइल प्रणालियां, ड्रोन और निगरानी तकनीक हासिल करता रहा है. अगर नेतन्याहू दोबारा सत्ता में आते हैं, तो मौजूदा रक्षा साझेदारी में निरंतरता रहने की संभावना है.
भारत और इजरायल के बीच कृषि तकनीक, पानी के बेहतर इस्तेमाल, नवाचार और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं हैं. नई सरकार की आर्थिक प्राथमिकताएं इन परियोजनाओं की रफ्तार को प्रभावित कर सकती हैं.
भारत के इजरायल के साथ मजबूत संबंध हैं, वहीं फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी उसका लंबे समय से समर्थन रहा है. गाजा युद्ध और ईरान के साथ तनाव के बीच भारत को अपने रणनीतिक हितों के साथ क्षेत्रीय शांति और स्थिरता का संतुलन बनाए रखना होगा.
इजरायल के इस चुनाव में नेतन्याहू की वापसी या विपक्ष की बढ़त, दोनों ही स्थितियों में भारत अपने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा. हालांकि स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में गठबंधन बनाने में लगने वाला समय और सहयोगी दलों की शर्तें नई सरकार की नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं.
भारत के लिए सबसे अहम सवाल यही होगा कि इजरायल की अगली सरकार रक्षा और तकनीक में सहयोग को कितनी प्राथमिकता देती है और क्षेत्रीय संघर्षों को लेकर उसका रुख क्या रहता है. ऐसे में चुनाव के नतीजों के साथ-साथ नई सरकार की विदेश नीति पर भी दुनिया की नजर रहेगी.