अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित गड़बड़ी के मामले में गिरफ्तार आरोपियों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अयोध्या बार एसोसिएशन ने आरोपियों का मुकदमा नहीं लड़ने का फैसला किया है। इसके बाद सवाल उठ रहा है कि अगर कोई वकील पैरवी करने से इनकार कर दे तो क्या आरोपी को कानूनी मदद से वंचित किया जा सकता है?
कानून के जानकारों के मुताबिक, किसी भी आरोपी को न्याय पाने और अपना पक्ष रखने का संवैधानिक अधिकार हासिल है. अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो अदालत किसी व्यक्ति को बिना बचाव के सजा नहीं दे सकती.
संविधान देता है वकील चुनने का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(1) हर व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील के जरिए अपना बचाव करने का अधिकार देता है. इसके अलावा संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के सामने समानता की बात करता है जबकि अनुच्छेद 39A सभी को समान न्याय और जरूरतमंदों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था करता है. यानी अगर किसी आरोपी को निजी वकील नहीं मिलता है तो अदालत की जिम्मेदारी होती है कि उसे कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए.
पहले भी कई मामलों में हुआ वकीलों का विरोध
देश में यह पहली बार नहीं है जब किसी मामले में बार एसोसिएशन ने आरोपी की पैरवी करने से इनकार किया हो. निर्भया गैंगरेप केस, मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब का मामला, संसद हमले के दोषी अफजल गुरु का मामला और कठुआ रेप केस जैसे मामलों में भी कई बार वकीलों के विरोध की स्थिति सामने आई थी. हालांकि न्यायिक प्रक्रिया के तहत बाद में आरोपियों को कानूनी सहायता के जरिए वकील उपलब्ध कराए गए ताकि मुकदमे की सुनवाई निष्पक्ष तरीके से हो सके.






