रायपुर । छत्तीसगढ़ में अफसरशाही और लालफीताशाही के आगे अब माननीयों के आदेश भी बौने साबित होने लगे हैं। प्रदेश में अधिकारियों की मनमानी और घोर उदासीनता का आलम यह है कि स्वयं कैबिनेट मंत्रियों के निर्देशों की खुलेआम अवहेलना की जा रही है। इसका ताजा और ज्वलंत उदाहरण शिक्षा विभाग में देखने को मिला है, जहां शिक्षा मंत्री, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा दिए गए स्पष्ट निर्देशों को विभागीय अधिकारियों ने ठेंगा दिखा दिया है।
मंत्री के आदेशों की खुली अवहेलना
माननीय शिक्षा मंत्री ने प्रदेश के शिक्षकों और शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के हित को ध्यान में रखते हुए निर्देश जारी किया था कि 30 जून तक हर हाल में पदोन्नति (प्रमोशन) की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। इस आदेश से वर्षों से पदोन्नति की बाट जोह रहे कर्मचारियों में एक नई उम्मीद जगी थी। परंतु, विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली और अड़ियल रवैये के कारण यह आदेश धरातल पर उतरने से पहले ही दम तोड़ गया। अधिकारियों की घोर उदासीनता और लेटलतीफी के चलते अब इस प्रक्रिया को 15 अगस्त तक के लिए टाल दिया गया है।
लोकतंत्र में अफसरशाही हावी
यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि छत्तीसगढ़ में माननीयों के आदेश का महत्व कम हो गया है। जब एक विभागीय मंत्री के स्पष्ट अल्टीमेटम के बावजूद अधिकारी काम नहीं कर रहे हैं, तो यह सीधा-सीधा शासन के आदेशों की अवहेलना का मामला बनता है। यह न केवल प्रशासनिक अक्षमता को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि प्रदेश में नौकरशाही किस कदर बेलगाम हो चुकी है।
शिक्षकों और कर्मचारियों में भारी आक्रोश
30 जून तक पदोन्नति का सपना देख रहे हजारों शिक्षकों और कर्मचारियों को इस फैसले से भारी निराशा हाथ लगी है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों की इस लापरवाही के कारण कर्मचारियों का मनोबल गिर रहा है। समय पर पदोन्नति न मिलने से उन्हें आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार का नुकसान झेलना पड़ रहा है।
मुख्य मांगें:
माननीय शिक्षा मंत्री के आदेशों की अवहेलना करने वाले और पदोन्नति प्रक्रिया में जानबूझकर देरी करने वाले लापरवाह अधिकारियों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
पदोन्नति प्रक्रिया को 15 अगस्त तक टालने के बजाय युद्ध स्तर पर कार्य कर इसे शीघ्र अति शीघ्र पूर्ण किया जाए।
शासन यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में माननीयों द्वारा जनहित और कर्मचारी हित में दिए गए आदेशों का पालन तय समय सीमा के भीतर हो।