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विपक्ष का जनता की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं,सत्तापक्ष कमियों को छुपाने करती है राजनीति

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 रायपुर। इन दिनों युवाओं को लुभाने सभी राजनीतिक दलों में होड़ सी मची है। लोकसभा का यह सत्र शोर शराबे के साथ समाप्त हो गई। जहां विपक्ष राम मंदिर,वंदे मातरम और युवाओं पर संसद के बाहर और भीतर शोर शराबे और आरोप प्रत्यारोप करते रहे, वहीं सत्ताधारी व्दारा सफाई देने के साथ सत्र समाप्त हो गये। 
    प्रत्येक संसद सत्र में सैकड़ों करोड़ रूपये देश का खर्च होता है, लेकिन देश के महान सांसदों को इससे कोई सरोकार नहीं। वे अपनी अपनी मांगों को पूरा करने के लिए आरोप प्रत्यारोप करते रहे और संसद का सत्र समाप्त हो गया। छत्तीसगढ़ विधानसभा भी आपसी छींटा कसी से अछूता नहीं रहा। 
        देश की जनता अपना विधायक या सांसद का चुनाव यह सोच कर चुनते हैं ताकि उन्हें बेहतर इलाज,अच्छी शिक्षा,बिना गढ्ढे की सड़क,खंबों में लाइट, नदी-नालों पर पुल के साथ महंगाई पर रोक लगाने में सक्षम हो सके। लेकिन ठीक इसके विपरीत गांव और शहरों के सड़कों पर गढ्ढे,टूटा पुल,वही पुरानी शिक्षण संस्थाएं, अस्पतालों में इलाज की कमी जैसे दर्जनों समस्याओं से जूझते और लगातार सरकार व्दारा बढ़ रहे टैक्स के बोझ तले दबना जैसे आम नागरिकों के भविष्य की मजबूरी बन गई है ,वे हमेशा स्वयं को ठगा सा महसूस करने लगे हैं।

     सत्ता में विपक्ष का काम नागरिकों को समस्याओं से राहत दिलाने उनकी लड़ाई लड़ना होता है। लेकिन वे पांच वर्षों तक निजी समस्याओं को हल करते समाप्त कर देते हैं । मानो उन्हें जनता सिर्फ मुख्य अतिथि के रूप में या उद्घाटन करने ही जनप्रतिनिधि बनाये जाते हों।
  अब मतदाताओं को सोचना है कि इन 80 वर्षों में देश के नागरिकों को किस सरकार ने राहत दी है या किसने परेशानियां बढ़ायी है।

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