धमधा। प्रदेश में संविदा और ठेका कर्मियों की संख्या नियमित कर्मचारियों से काफी ज्यादा है। इनका वेतन भी कम है नौकरी से निकाल दिए जाने का डर हमेशा बना रहता है । इसलिए वे मजबूरी में समय से ज्यादा मेहनत करते हैं । अधिकारियों का भी इन पर भारी दबाव रहता है। शासन इन संविदा और ठेका कर्मियों का वेतन बढ़ाकर वर्कलोड कम करके राहत प्रदान करें। वरिष्ठ नागरिक प्रदीप ताम्रकार ने उक्त आरोप लगाते हुए आगे कहा कि शासन की नीति समझ से परे हैं । संविदा और ठेका कर्मियों का इतना दोहन क्यों हो रहा है समय पर वेतन न देकर एक प्रकार से प्रताड़ित ही किया जा रहा है। अत्यधिक कार्यभार के चलते कई युवा आत्महत्या भी कर चुके हैं फिर भी शासन आंखें मूंदे हुए बैठी है।
कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव के पहले यह वादा किया था कि जब हम सत्ता में आएंगे तो नियमित कर उनकी व्यवस्था ठीक करेंगे,लेकिन वादा खिलाफी करने का खामियाजा उन्हें सत्ता से दूर कर दी।
वर्तमान भाजपा की सरकार मोदी की गारंटी के भरोसे सत्ता पाने में सफल रही लेकिन भाजपा सरकार फिर धोखा देने पर उतारू है। रोजाना धरना प्रदर्शन हो रहे हैं आखिर यह क्यों हो रहा है ? वर्तमान में नियमित कर्मचारी रिटायर होता है तो उसके काम के बोझ को संविदा या ठेका कर्मियों के ऊपर डाल दिया जाता है। नौकरी पक्की नहीं होने के कारण वह डर के कारण काम करने मना नहीं कर सकता काम करना मजबूरी हो गई है । खाने,पीने,सोने,आराम करने का कोई समय नहीं है इससे उनके स्वास्थ्य और मानसिकता पर भी भारी गलत प्रभाव पड़ रहा है। ठेकेदार इन श्रमिकों को वेतन भी समय पर न देकर परेशान करते हैं । इसी प्रकार कोरोना काल में संविदा कर्मियों के साथ सभी विभाग के संविदा कर्मी कोरोना पीड़ित होने के बाद भी सेवा करने में लगे हुए थे इतनी मेहनत और कम वेतन सरकार की आंखों में नहीं दिखती खुद का स्वार्थ अगर आ जाय तो कुछ भी प्रस्ताव पारित कर लेते हैं । अपना वेतन बढ़ाना अन्य सुविधाएं लेना उनके द्वारा प्रस्ताव लाना बाएं हाथ का खेल है। लेकिन संविदा और ठेका कर्मियों का हित उनकी आंखों में दिखाई नहीं देती। एक संत ने कहा है कि तुम्हारे पास ताकत है तो ग़लत उपयोग मत करो, प्रेम से सभी का सेवा करो वरना तिल-तिल कर मरने के लिए तैयार रहो। पद का घमंड ज्यादा दिन नहीं चलता जरूरतमंदों की जरूरतें पूरी करो सेवा करो सबका अधिकार उन्हें दो यह उचित होता है। ठेका कर्मी इतने परेशान हैं उन्हें वेतन समय पर नहीं मिलता जब काम बंद कर देते हैं तो नाम मात्र राशि देकर सामंजस्य बनाकर कर्मियों को काम में फिर लगा दिया जाता है। बाद में फिर वही ढर्रा चलते रहता हैं कई संस्थान में करोड़ों के घोटाले होते हैं यह राजस्व का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है इस पर सरकार ध्यान दें । अंत में ताम्रकार ने कहा कि संविदा व ठेका कर्मी बेहद तनाव में जीवन यापन कर रहे हैं आत्महत्या कर रहे हैं इसका उचित निराकरण कर इनको राहत दिलाएं। इनके ऊपर वर्कलोड को कम करें, यही अधिक वर्कलोड इनके तनाव का कारण बना हुआ है ताकि ये लोग भी खुशी जीवन यापन कर सके।